कौन कहता है रोज़गार नहीं है
वक़्त ऐसा भी बेकार नहीं है
छाँव क्यों ढूंढते हो किसी पेड़ की,
क्या खुद पे ज़रा ऐतबार नहीं है
तुम बनाओ तो एक आशियाना कहीं
तुम बढाओ तो एक पायदाना कभी
पहले सींचो तो मेहनत से अपना करम,
ज़माना तो दोषी हर बार नहीं है
राजीव त्रिपाठी
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