Saturday, April 10, 2010

Meri kavitayen- Swapnsundari

इस कदर ये नज़र जैसे थमती गयी, जादुई सी फिजा जैसे थमसी गयी


बढ़ रही बेखुदी ना रुकी जिंदगी,सांस में धड़कने ऐसे जमती गयीं

इस कदर ये नज़र जैसे थमती गयी

इस तरह न हुयी पहले आवारगी, आइना भी लगे जैसे तेरी छवि

ऐ परी ऐ कली शोख सी अनछुई, हुस्न की शायरी जैसे बनती गयी

इस कदर ये नज़र जैसे थमती गयी

तुम हो मलिका बहारों की ऐ कामिनी, रौशनी हो सितारों की ऐ चांदनी

हर सहर शाम हर बस तुम्ही से बनी, जिंदगी हर नज़र जैसे मिलती गयी

इस कदर ये नज़र जैसे थमती गयी

राजीव त्रिपाठी

1 comment:

  1. I think you forgot the old lukhda....
    it was
    is qadar ye nazar tham si gayi.
    jadui si fiza tham si gayi..
    badh rahi bekhudi na ruki zindgi,
    saans me dhadkane meri jamsi gayin...

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