Sunday, April 25, 2010

Search of Life

मुश्किल है जोड़ना इन्हें आसाँ है तोड़ना



रिश्तों की मासूमियत को कभी आज़मा के देख


इन्हें तोड़ने का शौक़ तेरा टूट जायेगा


ऐ तोड़ने वाले ज़रा रिश्ता बना के देख


रिश्तों की कसौटी पे खड़ी इंसानियत


इंसानियत के साथ कभी पेश आके देख


रौशन चिराग़ ज़िंदगी के हो जायेंगे


इक बार किसी दिल में रौशनी जलाके देख


बिखरा अँधेरा देख भागता दिल-ऐ नादाँ


घनघोर काली रात को अपना बना के देख


मुमकिन है ज़िंदगी में बड़ी तनहाइयाँ


तन्हाइयों के साथ कभी मुस्कुराके देख


राजीव त्रिपाठी






















Saturday, April 10, 2010

Meri kavitayen- Swapnsundari

इस कदर ये नज़र जैसे थमती गयी, जादुई सी फिजा जैसे थमसी गयी


बढ़ रही बेखुदी ना रुकी जिंदगी,सांस में धड़कने ऐसे जमती गयीं

इस कदर ये नज़र जैसे थमती गयी

इस तरह न हुयी पहले आवारगी, आइना भी लगे जैसे तेरी छवि

ऐ परी ऐ कली शोख सी अनछुई, हुस्न की शायरी जैसे बनती गयी

इस कदर ये नज़र जैसे थमती गयी

तुम हो मलिका बहारों की ऐ कामिनी, रौशनी हो सितारों की ऐ चांदनी

हर सहर शाम हर बस तुम्ही से बनी, जिंदगी हर नज़र जैसे मिलती गयी

इस कदर ये नज़र जैसे थमती गयी

राजीव त्रिपाठी

Meri kavitayen-Zazbaat

१.वीरान ज़िन्दगी में मौसम बदल रहा , ये तेरे साथ का असर लगता है


दूर तक इस अँधेरे में जुगनू कोई , किसी रात का रहगुज़र लगता है

फिर वही ख्वाहिशें फिर वही आरज़ू , फिर उसे खोने का डर लगता है

छोड़कर वो चला जायेगा अजनबी, न जाने फिर क्यों हमसफ़र लगता है

२.माना की आसमान पे तारे हैं बेशुमार,लेकिन सभी उल्कों में रौशनी नहीं होती,

होता वजूद-ए-आसमान न ये गुरूर का, हम जिस पे खड़े गर वो ज़मीं नहीं होती
 
राजीव त्रिपाठी

Friday, April 9, 2010

Self Belief

कौन कहता है रोज़गार नहीं है


वक़्त ऐसा भी बेकार नहीं है

छाँव क्यों ढूंढते हो किसी पेड़ की,

क्या खुद पे ज़रा ऐतबार नहीं है



तुम बनाओ तो एक आशियाना कहीं

तुम बढाओ तो एक पायदाना कभी

पहले सींचो तो मेहनत से अपना करम,

ज़माना तो दोषी हर बार नहीं है



राजीव त्रिपाठी

Monday, March 29, 2010

Inspiration

परदेसी ये बात न पूछो , कैसे हम आज़ाद हुए ,



कितनी माँ की गोद लुट गयी , कितने घर बर्बाद हुए


परदेशी ये बात न पूछो


बाल पाल और लाल ने लौटाई मिट्टी की कीमत थी ,


हँसते हँसते प्राण दे दिए देश-भक्ति की नीयत थी,


लहू से धरती लाल हो गयी इन सबके बलिदानों से


जब सुभाष ने माँगा था बस खून देश के जवानों से,


घर घर में था बसा तिरंगा चरखे का आनाद वहां


इक संकल्प सभी तन-मन में तोड़ो रावणराज यहाँ,


अंगारों पे आज़ादी की नींव वहां बन पाई थी


इन लपटों में जल-जल कर आज़ादी हमने पाई थी,


चौरा - चौरी जलियाँ वालां बाग़ गवाह शहादत का


ऐसे वीर न पहले आये ना ही उसके बाद हुए


कितनी माँ की गोद लुट गयी , कितने घर बर्बाद हुए


परदेसी ये बात न पूछो , कैसे हम आज़ाद हुए .
 
राजीव कुमार त्रिपाठी