मत पूछ हाल दिल का सुनाऊंगा किस क़दर, डर है ज़ुबाँ से सच को छुपाऊंगा किस क़दर
जुगनू को चमकने की इजाज़त नहीं जहाँ, मैं दीप दिवाली में जलाऊंगा किस क़दर
Sunday, October 8, 2017
आदरणीय प्रधानमंत्री जी
यद्यपि मैं इस बात का समर्थन करता हूँ कि भारत जैसे वैश्विक प्रजातांत्रिक देश में कम से कम दो से तीन ऐसे राजनीतिक दल होने चाहिए जिन्हें सरकार चलाने का पूरा अवसर मिले और राजनीतिक विविधता से परिपूर्ण हमारे देश पर अकेली व किसी एक प्रकार की विचार धारा थोपी ना जा सके, किंतु विडम्बना यह है कि जब भी हमारे देश में ग़ैर कांग्रेसी दल सत्ता पर क़ाबिज़ हुआ अगले अगले चुनाव में उसका सूपड़ा साफ़ हो गया और फिर वो विपक्ष या त्रिपक्ष की श्रेणी में अपना अस्तित्व खोजते रहे. ऐसा क्यों होता रहा? क्यों जनता जनार्दन ने लगातार दूसरी बार इन्हें पर्याप्त मत नहीं दिया? क्यों ऐसे दल अकेले या संयुक्त रूप से मिलकर वापसी नहीं कर सके? क्यों इन राजनीतिक दलों को वापस आने में वर्षों लगे, फिर भी ये जनमत पाकर सरकार नहीं चला पाए? इन प्रश्नो के उत्तर बहु-आयामी समीक्षा के योग्य हैं और राजनीति शास्त्र में शोध कर रहे शोधार्थियों के लिए बेहतर चुनौती,इन प्रश्नो पर निहसंदेह राजनीति के धुरंधरों की अपनी अलग राजनीतिक राय होगी परंतु सामान्यतः आम राय और अनुभूति क्या हो सकती है? आइए वर्तमान का रुख़ करें जहाँ पिछले लोकसभा चुनावों में जनता ने ऐतिहासिक जनमत देते हुए आपको अपनी और देश की कमान सौंपी साथ ही विधानसभा स्तर पर भी अधिकतर जगहों पर भाजपा या उनसे समर्थित दल सरकार चला रहे हैं. एक नागरिक की हैसियत से आनेवाले लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखकर वर्तमान में आपकी सरकार के कार्यों की समीक्षा कर सकते हैं, लेकिन यह बात भी बहुत महत्वपूर्ण हैं जिन कार्यों की हम समीक्षा करें वो जनहित में किए गए हैं या देशहित में या उनसे किसीका भी हित नहीं हुआ. आपके विरोधी एवं आपसे इत्तिफ़ाक़ नहीं रखने वाले बुद्ध-जन हाय तौबा मचाते हुए कहते हैं देश में सहिष्णुता नहीं रही, तिनको में सिमटा विपक्ष बार बार आपको आपके अच्छे दिन की दुहाई देता रहता है, मैं और मेरे जैसे बहुत सारे लोग इस पर यक़ीन नहीं रखते क्यूँकि ना तो हम इन प्रबुद्ध जनो की श्रेणी में आते है ना ही अपनी और परिवार की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए हमें इस परिभाषा में घुसने की आवश्यकता है. आपके धुर विरोधी कहते हैं आप भारत को हिंदुस्तान में बदल रहे हैं इस पर भी आम आदमी कोई सोच नहीं रखता होगा क्यूँकि पेट भरने के लिए रोटी और दाल की क़ीमत दोनो ही स्थितियों में एक ही होगी. वो कहते हैं आप हिन्दू समुदाय को ही नेतृत्व करते हैं, क्या फ़र्क़ पड़ता है हिन्दू समुदाय भी जीएसटी, रेरा और आर्थिक नाकेबंदी के दायरे मे बराबरी से मुक़ाबला कर रहा है और इस समुदाय का होने के आधार पर किसी प्रकार की आर्थिक छूट की कोई योग्यता निर्धारित नहीं की गई है. कोई दोराय नहींआप जनसंवाद में महारथी हैं और शायद आपके पूर्व कोई भी प्रधानमंत्री इस मामले में आपके आस पास नहीं दिखते, चाहे मन की बात हो या किसी भी मामले में सरकार या अपना पक्ष रखने का, शानदार ढंग से जनसंवाद करते हैं. लाख रु का प्रश्न ये है की क्या ये संवाद द्विपक्षीय है या केवल आपकी बात जनता तक पहुँच रही है? क्या भाजपा के पथ-प्रदर्शक के तौर पर स्थापित आरएसएस को भी ये महसूस हो रहा है कि जनता के मन की बात प्रधानमंत्री तक नहीं पहुँच रही? इसने कोई शक नहीं इतना स्पष्ट मज़बूत बहुमत मिला है तो स्वाभाविक तौर पर जन-अपेक्षाएँ भी प्रबल और इसके अनुरूप होंगी पर क्या ये सरकार इन तीन वर्षों में जनता की वास्तविक अपेक्षाएँ समझ सकी है या समझकर भी अनजान है या फिर दिवास्वप्न में जी रही है? ये भी सच है कि हमारा देश इस क़दर विविध है कि यहाँ अमीर और अमीर होते जा रहे हैं जबकि ग़रीब और ग़रीब और इन दोनो के बीच भारत का सबसे बड़ा तबक़ा है जो इन दोनो ही श्रेणियों के क़ाबिल नहीं, निश्चित तौर पर आर्थिक संतुलन असंतुलित है. इन तीन वर्षों में हमारी चुनी हुई इस सरकार ने कई आर्थिक सुधार के निर्णय लिए जो स्वागत योग्य हैं और विश्व में इनकी प्रशंसा हुयी लेकिन इनका क्रियान्वयन निश्चित तौर पर आधी अधूरी तैयारियों के साथ हुआ जिसके कारण मध्यम-वर्गीय आबादी को बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ा जिसका असंतोष महसूस किया जा सकता है. मध्यम-वर्गीय व्यापारी भी कुछ ऐसा ही असंतोष महसूस कर रहे हैं और शायद खुलकर ना सही पर दबी ज़ुबान में इसे ज़ाहिर भी कर रहे हैं, एक प्रकार का राजनीतिक एकतंत्र जनता को परेशान कर रहा है और शायद इसकी सुगबगाहट आप और अन्य मंत्रियों के मन तक नहीं पहुँच रही. व्यक्तिगत और हमारे देश के प्रधानमंत्री के तौर पर मैं आपका सम्मान करता हूँ क्योंकि निश्चित तौर पर पूरे विश्व में आपने अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक नेता के तौर पर अलग पहचान बनायी है लेकिन आपको याद रखना होगा की भारत में राज करके ही आप इसे स्थायित्व दे पाएँगे वरना लोगों की याद-दास्त बेहद कमज़ोर होती है. सुना है की आपकी शोध टीम अत्यंत कुशल एवं सक्रिय रहती है,जन मानस की नब्ज़ टटोलने में शायद यह पिछड़ रही है और आपकी ब्रांडिंग में अव्वल. पिछले साठ वर्षों में शासन करके कांग्रेस बूढ़ी हुयी है और अब यह देश साठ प्रतिशत युवाओं का राष्ट्र है इस मंत्र को समझिए ये कुछ कहता है और इसी मंत्र में हमारा, आपका और हमारे देश का भविष्य छुपा हुआ है...ग़ौरतलब है कि आप भी इन साठ प्रतिशत युवाओं को कुछ भरोसा देकर ही देश के प्रधान बने हैं और अब यही आबादी आपकी ओर आशा की कोमल दृष्टि से देख रही है, आपसे उम्मीद है युवाओं की इस कोमल दृष्टि को आप उनके कठोर नज़रिए में नहीं बदलने देंगे... आर्थिक रूप से संतुलित, ग़रीबी-मुक्त, भ्रष्टाचार-मुक्त व रोज़गार- युक्त भारत का निर्माण करें. शुभ-कामनाओं सहित
आपका राजीव त्रिपाठी
आजकल सोशल मीडिया में अनेक मुद्दों पर एक ही प्रकार की बहस छाई रहती है जिसने दो प्रकार के ही जीव वैचारिक प्रतिस्पर्धा में जीवंत तौर पर भाग लेते हैं जिन्हें प्रायः "भक्त" और " ग़ैर भक्तों" की तथाकथित श्रेणी में विभाजित किया जा सकता है. ग़ौरतलब है कि ग़ैर भक्त भी किसी ना किसी की भक्ति में लीन हैं, पर महत्त्वपूर्ण बात ये है की अधिकतर दोनो ही श्रेणियों के ये जीवंत प्राणी बिना किसी विचारधारा के बीच एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए "अंध-भक्ति "का रोमांचक प्रदर्शन करते हैं, ऐसा बिलकुल भी नहीं की इसके भाग लेने वाले सारे प्रतिभागी ऐसे है लेकिन ज़्यादातर लोगों की बातों को पढ़कर यही प्रतीत होता है कि " अंध-भक्ति" इनकी सामूहिक प्रजाति है. सतही ज्ञान, सस्ते शब्दों की शब्दावली और समुचित जानकारी के अभाव के बीच इनके बीच टी२० का रोमांचक मुक़ाबला पढ़ने को मिलता है और यूँ प्रतीत होता है कि आज ही सरकार गिराकर अपने हाँथों से राजनेताओं को सूली पर चढ़ा देंगे या फिर आज ही अपने हाथों से किसी राजनेता की वैश्विक ताजपोशी कर देंगे. ग़ैर भक्तों को सुबह चाय समय पर ना मिलने से देश में सहिष्णुता नज़र नहीं आती जबकि भक्तों को रिलायंस जीयो ने महिमामंडन हेतु भरपूर समय और डेटा दे रखा है, ग़ैर भक्तों को कश्मीर के हालातों की इस क़दर चिंता है कि लगता है कश्मीर को आज़ादी दिलाकर ही मानेंगे जबकि लगता है भक्त गण आज ही अस्त्र-शस्त्र लेकर स्वयं पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर का भारत में विलय करा देंगे. इन दोनो प्रजातियों में ग़ुस्सा भी प्रखर रूप से भरा पाया जाता है जिसके कारण सम्पूर्ण वार्तालाप में गाली-गलौच का प्रतिबिम्ब भी स्फुटित होता है और उस प्रतिबिम्ब में भी एक-दूसरे पर भारी पड़ने की ज़बरदस्त आज़माइश होती है, यूँ लगता है हर राष्ट्रीय समाचार चैनल पर शाम ६ बजे के बाद होने वाले तथाकथित वाद-विवाद का निम्न रूपेण अभ्यास व परिदृश्य अवलोकित हो रहा है. भक्तों को पूरे विश्व का नेतृत्व करने वाला मसीहा मिल गया है तो ग़ैर भक्तों को इस मसीहे में तुग़लकी शैतान नज़र आता है, एक बात तय नज़र आती है कि दोनो ही प्रकार के प्रति-स्पर्धी सबसे बड़े देश- भक्त हैं और इनसे संजीदा कोई नहीं, बस इनके हाथ से मोबाइल, लैप्टॉप या कलम छीनकर हथियार दे दो चंद क्षणों में देश का फ़ैसला कर देंगे. अलग अलग तरह के जुमले और परिभाषाएँ पढ़ने को मिलती हैं, पहले से ही समाजवादी, बहुजनवादी,मार्क्सवादी, हिन्दुत्ववादी, माओवादी, कट्टरवादी और आतंकवादी जैसे शब्द कानों में हलचल मचाते रहे हैं अब राष्ट्रवादी, ग़ैर राष्ट्रवादी शब्दों ने ध्वनि-प्रदूषण फैला रखा है. हे भक्त गणों कुछ किए बिना ही जय जयकार मत करो और हे ग़ैर भक्त गणों सिर्फ़ आलोचना करने के लिए आलोचना उचित नहीं बल्कि स्वस्थ आलोचना करनी चाहिए साथ ही समुचित जानकारी एवं तर्कों के साथ. मेरा व्यक्तिगत मत ये है की शायद इस प्रतिस्पर्धा में आबादी इसलिए भी बढ़ रही है क्यूँकि लोगों के पास कुछ और करने के लिए नहीं है सो यही करने में समय व्यतीत कर रहे हैं और यही हमारे देश में इस समय सबसे गम्भीर विषय है जिसकी चुनौती से हम पार नहीं पा रहे अतः दोनो ही प्रकार के जीवंत प्रतिभागियों में कोई न कोई निराशा छुपी है जिसे वो अपने तरीक़े से व्यक्त करने की असफल कोशिश कर रहे हैं. यही वो मुद्दा है जिसपर स्वस्थ परिचर्चा व आलोचना अपेक्षित है. इशारा तो आप समझ ही गये होंगे...
“दर्द होता रहा छटपटाते रहे, आईने॒से सदा चोट खाते रहे, वो वतन बेचकर मुस्कुराते रहे
हम वतन के लिए॒ सिर कटाते रहे”
280 लाख करोड़ का सवाल है ...
भारतीय गरीब है लेकिन भारत देश कभी गरीब नहीं रहा"* ये कहना है स्विस बैंक के डाइरेक्टर का. स्विस बैंक के डाइरेक्टर ने यह भी कहा है कि भारत का लगभग 280 लाख करोड़ रुपये उनके स्विस बैंक में जमा है. ये रकम इतनी है कि भारत का आने वाले 30 सालों का बजट बिना टैक्स के बनाया जा सकता है.
या यूँ कहें कि 60 करोड़ रोजगार के अवसर दिए जा सकते है. या यूँ भी कह सकते है कि भारत के किसी भी गाँव से दिल्ली तक 4 लेन रोड बनाया जा सकता है.
ऐसा भी कह सकते है कि 500 से ज्यादा सामाजिक प्रोजेक्ट पूर्ण किये जा सकते है. ये रकम इतनी ज्यादा है कि अगर हर भारतीय को 2000 रुपये हर महीने भी दिए जाये तो 60 साल तक ख़त्म ना हो. यानी भारत को किसी वर्ल्ड बैंक से लोन लेने कि कोई जरुरत नहीं है. जरा सोचिये ... हमारे भ्रष्ट राजनेताओं और नोकरशाहों ने कैसे देश को
लूटा है और ये लूट का सिलसिला अभी तक 2011 तक जारी है.
इस सिलसिले को अब रोकना बहुत ज्यादा जरूरी हो गया है. अंग्रेजो ने हमारे भारत पर करीब 200 सालो तक राज करके करीब 1 लाख करोड़ रुपये लूटा.
मगर आजादी के केवल 64 सालों में हमारे भ्रस्टाचार ने 280 लाख करोड़ लूटा है. एक तरफ 200 साल में 1 लाख करोड़ है और दूसरी तरफ केवल 64 सालों में 280 लाख करोड़ है. यानि हर साल लगभग 4.37 लाख करोड़, या हर महीने करीब 36 हजार करोड़ भारतीय मुद्रा स्विस बैंक में इन भ्रष्ट लोगों द्वारा जमा करवाई गई है.
भारत को किसी वर्ल्ड बैंक के लोन की कोई दरकार नहीं है. सोचो की कितना पैसा हमारे भ्रष्ट राजनेताओं और उच्च अधिकारीयों ने ब्लाक करके रखा हुआ है.
हमे भ्रस्ट राजनेताओं और भ्रष्ट अधिकारीयों के खिलाफ जाने का पूर्ण अधिकार है.हाल ही में हुवे घोटालों का आप सभी को पता ही है - CWG घोटाला, २ जी स्पेक्ट्रुम घोटाला , आदर्श होउसिंग घोटाला ... और ना जाने कौन कौन से घोटाले अभी उजागर होने वाले है ........