आजकल सोशल मीडिया में अनेक मुद्दों पर एक ही प्रकार की बहस छाई रहती है जिसने दो प्रकार के ही जीव वैचारिक प्रतिस्पर्धा में जीवंत तौर पर भाग लेते हैं जिन्हें प्रायः "भक्त" और " ग़ैर भक्तों" की तथाकथित श्रेणी में विभाजित किया जा सकता है. ग़ौरतलब है कि ग़ैर भक्त भी किसी ना किसी की भक्ति में लीन हैं, पर महत्त्वपूर्ण बात ये है की अधिकतर दोनो ही श्रेणियों के ये जीवंत प्राणी बिना किसी विचारधारा के बीच एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए "अंध-भक्ति "का रोमांचक प्रदर्शन करते हैं, ऐसा बिलकुल भी नहीं की इसके भाग लेने वाले सारे प्रतिभागी ऐसे है लेकिन ज़्यादातर लोगों की बातों को पढ़कर यही प्रतीत होता है कि " अंध-भक्ति" इनकी सामूहिक प्रजाति है. सतही ज्ञान, सस्ते शब्दों की शब्दावली और समुचित जानकारी के अभाव के बीच इनके बीच टी२० का रोमांचक मुक़ाबला पढ़ने को मिलता है और यूँ प्रतीत होता है कि आज ही सरकार गिराकर अपने हाँथों से राजनेताओं को सूली पर चढ़ा देंगे या फिर आज ही अपने हाथों से किसी राजनेता की वैश्विक ताजपोशी कर देंगे. ग़ैर भक्तों को सुबह चाय समय पर ना मिलने से देश में सहिष्णुता नज़र नहीं आती जबकि भक्तों को रिलायंस जीयो ने महिमामंडन हेतु भरपूर समय और डेटा दे रखा है, ग़ैर भक्तों को कश्मीर के हालातों की इस क़दर चिंता है कि लगता है कश्मीर को आज़ादी दिलाकर ही मानेंगे जबकि लगता है भक्त गण आज ही अस्त्र-शस्त्र लेकर स्वयं पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर का भारत में विलय करा देंगे. इन दोनो प्रजातियों में ग़ुस्सा भी प्रखर रूप से भरा पाया जाता है जिसके कारण सम्पूर्ण वार्तालाप में गाली-गलौच का प्रतिबिम्ब भी स्फुटित होता है और उस प्रतिबिम्ब में भी एक-दूसरे पर भारी पड़ने की ज़बरदस्त आज़माइश होती है, यूँ लगता है हर राष्ट्रीय समाचार चैनल पर शाम ६ बजे के बाद होने वाले तथाकथित वाद-विवाद का निम्न रूपेण अभ्यास व परिदृश्य अवलोकित हो रहा है. भक्तों को पूरे विश्व का नेतृत्व करने वाला मसीहा मिल गया है तो ग़ैर भक्तों को इस मसीहे में तुग़लकी शैतान नज़र आता है, एक बात तय नज़र आती है कि दोनो ही प्रकार के प्रति-स्पर्धी सबसे बड़े देश- भक्त हैं और इनसे संजीदा कोई नहीं, बस इनके हाथ से मोबाइल, लैप्टॉप या कलम छीनकर हथियार दे दो चंद क्षणों में देश का फ़ैसला कर देंगे. अलग अलग तरह के जुमले और परिभाषाएँ पढ़ने को मिलती हैं, पहले से ही समाजवादी, बहुजनवादी,मार्क्सवादी, हिन्दुत्ववादी, माओवादी, कट्टरवादी और आतंकवादी जैसे शब्द कानों में हलचल मचाते रहे हैं अब राष्ट्रवादी, ग़ैर राष्ट्रवादी शब्दों ने ध्वनि-प्रदूषण फैला रखा है. हे भक्त गणों कुछ किए बिना ही जय जयकार मत करो और हे ग़ैर भक्त गणों सिर्फ़ आलोचना करने के लिए आलोचना उचित नहीं बल्कि स्वस्थ आलोचना करनी चाहिए साथ ही समुचित जानकारी एवं तर्कों के साथ. मेरा व्यक्तिगत मत ये है की शायद इस प्रतिस्पर्धा में आबादी इसलिए भी बढ़ रही है क्यूँकि लोगों के पास कुछ और करने के लिए नहीं है सो यही करने में समय व्यतीत कर रहे हैं और यही हमारे देश में इस समय सबसे गम्भीर विषय है जिसकी चुनौती से हम पार नहीं पा रहे अतः दोनो ही प्रकार के जीवंत प्रतिभागियों में कोई न कोई निराशा छुपी है जिसे वो अपने तरीक़े से व्यक्त करने की असफल कोशिश कर रहे हैं. यही वो मुद्दा है जिसपर स्वस्थ परिचर्चा व आलोचना अपेक्षित है. इशारा तो आप समझ ही गये होंगे...
राजीव

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