परदेसी ये बात न पूछो , कैसे हम आज़ाद हुए ,
कितनी माँ की गोद लुट गयी , कितने घर बर्बाद हुए
परदेशी ये बात न पूछो
बाल पाल और लाल ने लौटाई मिट्टी की कीमत थी ,
हँसते हँसते प्राण दे दिए देश-भक्ति की नीयत थी,
लहू से धरती लाल हो गयी इन सबके बलिदानों से
जब सुभाष ने माँगा था बस खून देश के जवानों से,
घर घर में था बसा तिरंगा चरखे का आनाद वहां
इक संकल्प सभी तन-मन में तोड़ो रावणराज यहाँ,
अंगारों पे आज़ादी की नींव वहां बन पाई थी
इन लपटों में जल-जल कर आज़ादी हमने पाई थी,
चौरा - चौरी जलियाँ वालां बाग़ गवाह शहादत का
ऐसे वीर न पहले आये ना ही उसके बाद हुए
कितनी माँ की गोद लुट गयी , कितने घर बर्बाद हुए
परदेसी ये बात न पूछो , कैसे हम आज़ाद हुए .
राजीव कुमार त्रिपाठी
कितनी माँ की गोद लुट गयी , कितने घर बर्बाद हुए
परदेशी ये बात न पूछो
बाल पाल और लाल ने लौटाई मिट्टी की कीमत थी ,
हँसते हँसते प्राण दे दिए देश-भक्ति की नीयत थी,
लहू से धरती लाल हो गयी इन सबके बलिदानों से
जब सुभाष ने माँगा था बस खून देश के जवानों से,
घर घर में था बसा तिरंगा चरखे का आनाद वहां
इक संकल्प सभी तन-मन में तोड़ो रावणराज यहाँ,
अंगारों पे आज़ादी की नींव वहां बन पाई थी
इन लपटों में जल-जल कर आज़ादी हमने पाई थी,
चौरा - चौरी जलियाँ वालां बाग़ गवाह शहादत का
ऐसे वीर न पहले आये ना ही उसके बाद हुए
कितनी माँ की गोद लुट गयी , कितने घर बर्बाद हुए
परदेसी ये बात न पूछो , कैसे हम आज़ाद हुए .
राजीव कुमार त्रिपाठी
